क्या आपने गौर किया है कि आजकल छोटे बच्चे मैदान में खेलने के बजाय घंटों मोबाइल या टैबलेट में व्यस्त रहते हैं? जिन नन्हे हाथों में खिलौने होने चाहिए, वे अब स्मार्टफोन पकड़ रहे हैं। इसी आदत ने बच्चों की सेहत पर खतरनाक असर डालना शुरू कर दिया है। हाल ही में AIIMS रायपुर की एक स्टडी में इस बात का चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चे दिन में औसतन 2.2 घंटे मोबाइल स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं।
स्टडी से सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े:
| आयु वर्ग | औसत स्क्रीन टाइम | WHO की अनुशंसित सीमा |
|---|---|---|
| 2 साल से कम | 1.2 घंटे | 0 घंटे |
| 5 साल से कम | 2.2 घंटे | 1 घंटे |
- 70% से अधिक भारतीय बच्चे तय सीमा से ज्यादा समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं।
- स्टडी में कुल 10 रिसर्च रिपोर्ट्स और 2857 बच्चों का विश्लेषण किया गया।
मोबाइल से बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव:
- भाषा विकास में रुकावट
- सामाजिक व्यवहार में गिरावट
- नींद की समस्याएं और मोटापा
- केंद्रित ध्यान की कमी और मानसिक अवसाद
- बौद्धिक विकास में रुकावट
“मोबाइल चलाने वाला बच्चा स्मार्ट नहीं बल्कि मंदबुद्धि बनता है।” — AIIMS रायपुर
डॉक्टरों की चेतावनी:
AIIMS रायपुर के डॉ. आशीष खोब्रागड़े और एम स्वाति शेनॉय के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च में यह स्पष्ट हुआ है कि अधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों की मेंटल हेल्थ पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।
“एक 6 महीने का बच्चा मोबाइल चला रहा है ये गर्व की नहीं, चिंता की बात है।”
समाधान क्या है?
- स्क्रीन फ्री ज़ोन बनाएं – जैसे कि बेडरूम और डाइनिंग एरिया।
- परिवार के साथ समय बिताएं – कहानियां सुनाएं, खेल खेलें।
- खाना खाते वक्त और सोने से पहले मोबाइल से दूरी रखें।
- ऑनलाइन कंटेंट के बजाय ऑफलाइन एक्टिविटी को बढ़ावा दें।
- माता-पिता खुद मोबाइल का प्रयोग कम करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल:
Q: मोबाइल की लत कैसे छुड़ाएं?
A: बच्चे को वैकल्पिक गतिविधियों में व्यस्त रखें, स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करें।
Q: बच्चों से मोबाइल की लत कैसे छुड़ाएं?
A: खेल, कहानियां, आर्ट्स आदि में रुचि बढ़ाएं और उन्हें स्क्रीन फ्री समय दें।
Q: 1 दिन में कितने घंटे मोबाइल चलाना चाहिए?
A: WHO के अनुसार 5 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए 1 घंटे से अधिक नहीं।
निष्कर्ष:
बच्चों को स्मार्ट बनाना है तो स्मार्टफोन से दूर रखें। AIIMS की रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि मोबाइल की लत आज की सबसे बड़ी पेरेंटिंग चुनौती है। इसके दुष्परिणाम आज नहीं तो कल पूरे जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। आइए, इस डिजिटल जहर से अपने बच्चों को बचाएं और उन्हें असली दुनिया से जोड़ें।
“बच्चों का भविष्य मोबाइल नहीं, माता-पिता की मौजूदगी तय करती है।”




